कहीं प्यासी मरुभूमि,
तो कहीं फूस के छप्पर।
कहीं मुलायम पात,
कहीं कोमल गात पर।
फुनगियों को चूमती,
जी भर दुलार करती।
अँधेरी बँसवार में,
जाने क्या कुछ ढूँढती।
हर जगह,हर तरफ,
ये मतवाली जा रही है।
बूँदों की मद्धम ताल ,
देखो बरखा गा रही है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
मेरा हाल पूँछा
आज उन्होंने हँसकर मेरा हाल पूँछा। झुकी नजरों ने मुझसे इक सवाल पूँछा। जिसका जवाब हम उनसे चाहते थे, उन्होंने उसी सवाल का जवाब ...
-
किस्सा दर्द का है फिर भी सुनाता हूं इसे गुनगुना कर । वो रूठ कर खुश हो ले, मैं भी खुश होता हूँ उसे मनाकर । एक रात के मुसाफिर से तू इजहार-ए-...
-
मुझे सम्हालो बहक गये हम, पीकर नयनों के मस्त प्याले। सब ओर अँधेरा कर बैठे ये, जो खुले केश उनके घुँघराले। दंतकान्ति ब...
-
आज उन्होंने हँसकर मेरा हाल पूँछा। झुकी नजरों ने मुझसे इक सवाल पूँछा। जिसका जवाब हम उनसे चाहते थे, उन्होंने उसी सवाल का जवाब ...
No comments:
Post a Comment