Monday, September 25, 2017

कहानी लिख दें

आओ  एक  कहानी लिख दें।
इक राजा  इक रानी लिख दें।

जुल्फों  को  आजाद करो तो ,
काली घटा मस्तानी लिख दें।

तुम  हौले हौले कदम बढ़ाओ,
हम दरिया की रवानी लिख दें।

तेरी इस कातिल अंगड़ाई को,
हम मदमस्त जवानी लिख दें।

तेरे ऐसे मुस्काने को  'कुमार',
सुबह की धूप सयानी लिख दें।

   

वो भी सही

वादे ही थे,वादों का क्या?
तुमने किये कुछ मैने किये
जो निभ गये  वो भी सही,
जो  रह गये  वो भी सही।

चंद जज्बात  दिल  में थे,
तुमको सुनाने के खातिर
जो कह गये  वो भी सही,
जो रह  गये  वो भी सही।

कुछ  कदम  उठते अगर,
तो  मंजिल दूर  थोड़े थी
जो उठ गये  वो भी सही,
जो रह  गये  वो भी सही।

तेरी  बेरुखी  के  मायने,
हम नासमझ क्या समझे
जो समझ गये वो भी सही,
जो रह  गये वो भी सही।

खतायें  जितनी  भी हुई,
इल्ज़ाम  मुझपे  मढ़ दिये
जो मढ़ गये  वो भी सही,
जो रह गये  वो भी सही।

मेरे  सोये  अरमानों  को,
पंख  तुमने  ही  दिये  थे
जो उड़ गये  वो भी सही,
जो रह गये  वो भी सही।

खुद को सताये जा रहें हैं!

आजकल हम  खुद  ही  खुद को सताये जा रहे हैं ।
मुस्कुराहट की आड़ में ग़म को छिपाये जा रहे हैं ।

कोई नही है जिससे अपने दिल की बात कह लेता,
खुद को ही अपना हाल ए दिल सुनाये जा रहे हैं ।

सारी रात हमने करवटें बदलकर गुजारी है मगर,
उनके जगाने पर नींद का स्वांग रचाये जा रहे हैं ।

कोई और कहने वाला हो तो सच भी झूठ लगता है,
आजकल एक झूठ को हम सच बताये जा रहे हैं ।

इन आँसुओं का मुझसे कोई वास्ता नही है  'कुमार'
गैर हो चुके एक शख़्स के लिये इन्हें बहाये जा रहे हैं ।

भूल

उम्र सारी बस यही इक भूल हम करते रहे।
जो मेरा था ही नही हम उसी पर मरते रहे।

उनके फरेबों से अनजान हों ऐसा भी नही,
घर से निकले तो फिर रास्ते पर चलते रहे।

उनकी खामोशी ने ही ये हुनर बख्शा मुझे,
वो चुप भी रहे तो हम जाने क्या सुनते रहे।

कारवाँ जब भी गमों का इधर से गुजरा किया,
हम भले चाहें न चाहें वो घर मेरे रुकते रहे।

कोई तो है जिसकी दुआएँ मेरे काम आती हैं,
दुश्मनों के दिये जख्म यूँ ही तो नही भरते रहे।

बचाना है !

कलियों को भँवरों  की बुरी नजर से बचाना है।
डोलती कश्ती को लहरों की जद से बचाना है।

फरमान अगर सरकारी  भी है  तो क्या हुआ ?
अपने आशियानों को  बुलडोजर से बचाना है।

रफ़्तार देकर ज़िन्दगी का सुख चैन छीन ले जो,
हमें गाँवों को अपने  भागते शहर से बचाना है।

हर  खुशी  के  लिए  मशीनों  का  मुँह ताकती ,
जिंदगी  को  मशीनों  की गिरफ्त से बचाना है।

बद-दुआएँ तो हमारे हिस्से  में भी हैं  'कुमार' ,
हमें  खुद  को  इनके  बुरे असर से  बचाना है।

कौन?

चाँद का हसीं पैगाम आया ।
हवाओं  का सलाम  आया ।

बहारों  ने  हैं  राहें  सजाई ,
बाग में एक फूल मुस्कुराया।

नदियां कल कल करती हैं ,
कोई गीत  फिजा  ने गाया ।

पक्षियों का मधुर कलरव है,
फूल पर भंवरा गुनगुनाया ।

कौन उतरा 'कुमार' जमीं पर,
सबने अदब से सिर झुकाया।

दो पल

यदि  दो  पल और ठहर जाते तुम।
दिल  में कुछ गहरे उतर जाते तुम।

हर एक छुअन  पर  सिहर  उठना,
शायद इस शर्म से उबर जाते तुम।

कर  देता  तुमको बेचैन  मैं इतना ,
मुझे अपनी बाहों में भर जाते तुम।

यदि समझ  पाते  दिल की हसरत,
तब हद से आगे  गुजर जाते  तुम।

मेरा हाल पूँछा

आज  उन्होंने  हँसकर  मेरा हाल पूँछा। झुकी नजरों ने मुझसे इक सवाल पूँछा। जिसका  जवाब  हम  उनसे  चाहते  थे, उन्होंने  उसी  सवाल  का जवाब  ...